Sex with chachi in sleeper bus and then threesome with conductor
दोपहर की तपिश कमरे की दीवारों से छनकर अंदर आ रही थी। रोहन ने दरवाजे की कुंडी खटखटाई।
"नमस्ते चाची!"
अंदर से पायल की छनछनाहट सुनाई दी। मालती ने दरवाजा खोला। सूती साड़ी, माथे पर छोटी सी बिंदी और चेहरे पर एक ऐसी मुस्कान जो किसी गहरे राज को छिपाए हुए थी।
"अरे रोहन, तुम आ गए! मैं तुम्हारा ही इंतज़ार कर रही थी।"
"हाँ चाची, जल्दी से तैयार हो जाइए। हमें आज रात की स्लीपर बस पकड़नी है, वरना शादी के मुख्य समारोह तक नहीं पहुँच पाएंगे।"
मालती ने अपनी आँखों को थोड़ा सिकोड़ा और रोहन को ऊपर से नीचे तक देखा।
"ठीक है बेटा, मैं तैयार होती हूँ। तुम तब तक टीवी देखो और आराम करो।"
मालती अपने कमरे की ओर बढ़ गई। रोहन को अचानक महसूस हुआ कि उसका पेट मरोड़ रहा है। वह बाथरूम ढूंढने लगा। गलियारे के अंत में एक दरवाजा आधा खुला था। रोहन ने बिना सोचे-समझे अंदर कदम रखा।
सामने का नज़ारा उसकी साँसें रोक देने के लिए काफी था। मालती केवल अपनी रेशमी ब्रा और पैंटी में थी। वह आईने के सामने खड़ी होकर अपनी पीठ पर हुक लगाने की कोशिश कर रही थी। उसकी कमर का घुमाव और गोरा रंग कमरे की हल्की रोशनी में चमक रहा था।
मालती को लगा कि कोई उसे देख रहा है। वह झटके से पीछे मुड़ी।
"कौन है वहाँ?"
रोहन घबराकर दीवार के पीछे छिप गया। उसका दिल सीने में हथौड़े की तरह बज रहा था। मालती ने आहट सुनी और बाहर आई।
"अरे रोहन! तुम यहाँ क्या कर रहे हो?"
रोहन की नज़रें मालती के खुले शरीर पर जमी थीं। वह हकलाने लगा।
"अ... अरे चाची, मैं तो बाथरूम ढूंढ रहा था। मुझे पता नहीं था कि आप..."
मालती ने देखा कि रोहन की नज़रें उसकी छाती और जाँघों के बीच झूल रही थीं। उसने गौर किया कि रोहन की पैंट के बीच में एक स्पष्ट उभार बन चुका था। मालती के होंठों पर एक शरारती मुस्कान तैर गई। उसने खुद को ढंकने की कोशिश नहीं की, बल्कि थोड़ा और करीब आई।
"बाथरूम तो उस तरफ है, बेटा। तुम रास्ता भूल गए या कुछ और ढूंढ रहे थे?"
रोहन ने अपनी पैंट को नीचे खींचने की कोशिश की, लेकिन उभार और बढ़ गया।
"ठीक है चाची, आप तैयार हो जाइए। मैं बाथरूम से आता हूँ।"
बाथरूम के अंदर पहुँचकर रोहन ने दीवार का सहारा लिया। उसका नौ इंच का अंग पूरी तरह सख्त हो चुका था।
"धत तेरे की! यह क्या हो गया मुझे। वह सिर्फ मेरी चाची है... लेकिन वह कितनी सुंदर लग रही थी।"
उसने जैसे-तैसे खुद को संभाला और पैंट पहन ली, लेकिन उभार अब भी साफ़ दिख रहा था। कुछ देर बाद दोनों बस स्टैंड के लिए निकले। रात का सन्नाटा और ठंडी हवा उनके बीच की खामोशी को और गहरा कर रही थी।
बस स्टैंड पर पहुँचते ही उन्होंने अपनी स्लीपर बस देखी। कंडक्टर किशोर, जिसकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी और शरीर पर पसीने की गंध, उन्हें उनकी सीट की ओर ले गया।
"यह रहा आपका केबिन। दो लोगों की स्लीपर सीट है।"
रोहन ने केबिन के अंदर देखा। वह बहुत छोटा था।
"चाची, हम इसमें कैसे जाएंगे? जगह बहुत कम है।"
मालती ने रोहन की आँखों में देखा और धीरे से मुस्कुराई।
"कोई बात नहीं बेटा, हम दोनों एक-दूसरे से सटकर सो जाएंगे। वैसे भी सफर लंबा है।"
किशोर कंडक्टर ने उन्हें देखते हुए एक गहरी साँस ली और धीमी आवाज़ में बोला।
"आराम से सोइएगा, मैडम। अगर किसी भी चीज़ की ज़रूरत हो, तो बस घंटी बजा दीजिएगा।"
केबिन के अंदर जाते ही रोहन ने पर्दा गिरा दिया और लॉक लगा दिया। मालती दूसरी तरफ मुड़कर लेट गई, लेकिन उसकी साँसें तेज़ थीं। रोहन की बेचैनी अब चरम पर थी। उसका अंग पैंट फाड़कर बाहर आने को बेताब था।
रोहन धीरे से खिसका और अपने उभार को मालती की कमर और कूल्हों से छुआ दिया। मालती अचानक सिहर गई। वह झटके से पीछे मुड़ी।
"यह क्या है, रोहन?"
रोहन ने अपनी नज़रें झुका लीं, लेकिन उसकी आवाज़ में एक अजीब सी कशिश थी।
"कुछ नहीं चाची... बस पता नहीं क्यों, दोपहर से ही यह ऐसा हो गया है। जबसे मैंने आपको उस हालत में देखा, मुझे बहुत बेचैनी हो रही है। क्या आप एक बार देखेंगी कि क्या हुआ है?"
मालती की आँखों में चमक आ गई। उसने रोहन की चाल समझ ली थी, लेकिन उसे यह खेल पसंद आया।
"ठीक है बेटा, दिखाओ मुझे।"
रोहन ने अपनी पैंट की चेन खोली और अपना विशाल अंग बाहर निकाल दिया। मालती की आँखें फटी की फटी रह गईं।
"बाप रे! इतना बड़ा?"
"हाँ चाची, आपको देखकर यह ऐसा हो गया है।"
मालती ने धीरे से अपना हाथ बढ़ाया और उसे सहलाने लगी। उसकी उँगलियों का स्पर्श बिजली की तरह रोहन के शरीर में दौड़ गया।
"क्या अब तुम्हें आराम मिल रहा है, रोहन?"
रोहन ने मालती का हाथ और कसकर पकड़ लिया।
"अब आराम सिर्फ एक ही चीज़ से मिलेगा चाची... और आप जानती हैं कि वह क्या है।"
मालती थोड़ा झिझकी, लेकिन उसकी अपनी इच्छाएं जाग चुकी थीं।
"लेकिन... अगर किसी को पता चल गया तो?"
"नहीं चाची, किसी को पता नहीं चलेगा। हमने केबिन लॉक कर लिया है। बाहर शोर है, यहाँ हमारी आवाज़ें दब जाएंगी। यह बात सिर्फ हमारे बीच रहेगी।"
मालती की साँसें और भारी हो गईं। उसने धीरे से अपनी साड़ी का पल्लू खिसकाया और अपनी ब्रा का हुक खोल दिया। उसके स्तन बाहर आ गए।
"तुम सही कह रहे हो... यह हमारे बीच ही रहेगा।"
उसने रोहन को अपनी ओर खींचा और उसके होंठों से अपने होंठ मिला दिए। उनकी जीभें एक-दूसरे से उलझ गईं।
"म्म्म... रोहन... यह इतना अच्छा क्यों लग रहा है?"
रोहन ने उसे और कसकर जकड़ लिया।
"आज बहुत मज़ा आएगा चाची। चलिए, पूरी तरह नग्न हो जाते हैं। बिना कपड़ों के चुदाई में अलग ही मज़ा है।"
मालती ने अपनी पैंटी भी उतार फेंकी। वह अब पूरी तरह नग्न थी, उसकी त्वचा अंधेरे में मखमली लग रही थी।
"अब मैं तुम्हारी हूँ... जैसे चाहो, वैसे ले लो।"
रोहन ने उसे नीचे लिटाया और अपना अंग उसके चेहरे के करीब लाया।
"अब इसे अपने मुँह में भरो, चाची।"
मालती ने धीरे से उसे अपने होंठों के बीच लिया। वह इतना बड़ा था कि उसका गला तक भर गया।
"म्म्म... म्म्म..."
"हाँ चाची, पूरा अंदर लो! और तेज़ी से!"
मालती का सिर आगे-पीछे हो रहा था। उसकी जीभ उस पर फिसल रही थी। रोहन की कराहें केबिन में गूँजने लगीं।
"आह चाची! अब आपकी बारी है। आपकी यह गीली चुत मेरा इंतज़ार कर रही है।"
मालती ने अपनी टाँगें फैला दीं। वह पहले से ही रस से तरबतर थी।
"आओ बेटा... मुझे दिखाओ कि तुम अपनी चाची को कितना प्यार कर सकते हो।"
रोहन ने अपनी जीभ से उसकी चुत को सहलाया। मालती की कमर ऊपर उठी।
"आह! रोहन... तुम्हारी ज़ुबान... म्म्म... यह क्या कर रहे हो!"
"आपकी चुत का रस अमृत जैसा है, चाची।"
जगह कम थी, इसलिए रोहन उसके ऊपर आया और मिशनरी पोजीशन में खुद को सेट किया।
"चाची, मुझे यह पोजीशन बहुत पसंद है। मैं आपको चूमते हुए अंदर जाना चाहता हूँ।"
"हाँ... मुझे भी यही चाहिए। अब देर मत करो।"
रोहन ने धीरे से अपना सिरा अंदर डाला। मालती की चुत बहुत तंग थी।
"आह... रोहन... तुम सच में बहुत बड़े हो... थोड़ा और थूक लगाओ।"
रोहन ने उसे गीला किया और एक ज़ोरदार झटका मारा।
"आह! पूरा अंदर चला गया!"
मालती की चीख निकल गई, लेकिन उसने उसे अपने होंठों में दबा लिया।
"रोहन... इतना गहरा... मुझे लगा मेरी साँस रुक जाएगी।"
"अब मैं रुकने वाला नहीं हूँ, चाची।"
रोहन ने तेज़ धक्के मारना शुरू किया। केबिन की दीवारें उनके शरीर के टकराव से हिल रही थीं। मालती की सिसकियाँ और तेज़ हो गईं।
"आह... रोहन... मैं पागल हो रही हूँ... और तेज़... और गहरा!"
रोहन ने उसकी जीभ को चूसते हुए अपनी रफ्तार बढ़ा दी। आधे घंटे तक यह सिलसिला चलता रहा। अंत में रोहन ने उसकी आँखों में देखा।
"चाची, क्या मैं अपना सारा माल आपकी बच्चेदानी में गिरा दूँ?"
"हाँ... डाल दो... मुझे तुम्हारा हर एक कतरा चाहिए!"
रोहन ने एक आखिरी, सबसे गहरा झटका मारा और उसका गरम वीर्य मालती के अंदर फूट पड़ा।
"आह... आह... मैं गिर रहा हूँ... मैं आपको भर रहा हूँ!"
मालती का शरीर काँपने लगा। वह पूरी तरह संतुष्ट हो चुकी थी। वीर्य इतना ज़्यादा था कि वह किनारे से रिसने लगा। पूरे केबिन में सेक्स की तीखी गंध फैल गई।
कुछ देर बाद, जब दोनों की साँसें सामान्य हुईं, मालती ने शरारत से कहा।
"देखो... मेरी साड़ी बर्बाद कर दी तुमने।"
रोहन ने उसे चूमते हुए कहा।
"यह तो बस शुरुआत थी, चाची।"
तभी, केबिन के दरवाज़े पर एक ज़ोरदार दस्तक हुई।
"सब ठीक है अंदर? बहुत आवाज़ें आ रही थीं।"
वह कंडक्टर किशोर था। रोहन और मालती के होश उड़ गए। मालती ने जल्दी से चादर ओढ़ी, लेकिन किशोर ने चादर के नीचे से उनके नग्न शरीर और फर्श पर फैले वीर्य को देख लिया।
किशोर ने धीरे से दरवाज़ा खोला और अंदर दाखिल हुआ। उसकी आँखों में गुस्सा नहीं, बल्कि एक भयंकर वासना थी।
"तो... यहाँ अंदर यह सब चल रहा था? भांजे और चाची का ऐसा प्यार?"
मालती घबरा गई।
"देखिए किशोर जी... वह... हम..."
किशोर ने अपनी पैंट की चेन खोली और अपना मोटा, काला अंग बाहर निकाला।
"शशश... चुप रहिए मैडम। मुझे कोई शिकायत नहीं है। बल्कि, मुझे लगता है कि इस खेल में एक तीसरे की ज़रूरत है।"
रोहन ने किशोर की ओर देखा। वह डर रहा था, लेकिन उसका अंग फिर से खड़ा होने लगा था।
"आप... आप क्या कहना चाहते हैं?"
किशोर ने मालती की कमर पकड़ी और उसे अपनी ओर खींचा।
"मैं चाहता हूँ कि आज रात इस केबिन में कोई अकेला न रहे। तुम उसे आगे से संभालो, और मैं इसे पीछे से।"
मालती ने रोहन की ओर देखा और फिर किशोर की ओर। खतरे और रोमांच के मिश्रण ने उसे फिर से उत्तेजित कर दिया।
"क्या तुम तैयार हो, रोहन? एक और मर्द के साथ?"
रोहन ने गहरी साँस ली।
"हाँ चाची... मैं तैयार हूँ।"
किशोर ने मालती को घुटनों के बल झुकाया और उसके पीछे से अपनी पकड़ मज़बूत की। रोहन ने फिर से मालती के होंठों को अपने कब्ज़े में लिया।
"आह... किशोर... तुम बहुत सख्त हो!"
"अभी तो तुमने असली मज़ा देखा ही नहीं है, मैडम।"
अब केबिन में तीन शरीर एक-दूसरे में उलझे हुए थे। किशोर पीछे से मालती को बेरहमी से धकेल रहा था, जबकि रोहन उसके स्तनों और होंठों के साथ खेल रहा था। मालती की कराहें अब दोगुनी हो गई थीं।
"आह... रोहन... किशोर... मैं... मैं मर जाऊँगी... इतना सुख!"
"चुपचाप महसूस करो, मैडम। आज रात तुम दोनों की रानी हो।"
किशोर की रफ़्तार बढ़ती गई। रोहन ने भी फिर से मालती के अंदर प्रवेश किया। मालती अब दो तरफ से भर चुकी थी। वह पागलपन की स्थिति में थी।
"हाँ... ऐसे ही... मुझे और चाहिए... मुझे और भरो!"
तीनों के शरीर पसीने से तरबतर थे। केबिन की हवा भारी हो गई थी। अंत में, किशोर ने एक ज़ोरदार चीख मारी और मालती की पीठ पर अपना माल गिरा दिया, जबकि उसी पल रोहन ने भी उसके अंदर अपना दूसरा दौर पूरा किया।
तीनों एक-दूसरे के ऊपर ढह गए। सन्नाटा छा गया, सिर्फ उनकी तेज़ साँसें सुनाई दे रही थीं।
किशोर ने अपनी पैंट ठीक की और एक तिरछी मुस्कान के साथ बोला।
"लगता है सफर यादगार रहा।"
मालती ने अपनी साड़ी ठीक करते हुए कहा।
"यह राज... हम तीनों के बीच रहेगा?"
"बिल्कुल, मैडम। मेरी खामोशी की कीमत आप दोनों के इस रूप को देखना था।"
किशोर बाहर निकल गया और पर्दा गिर गया। रोहन और मालती एक-दूसरे की बाहों में सिमट गए।
"चाची... यह तो उम्मीद से ज़्यादा हो गया।"
मालती ने रोहन के माथे को चूमा।
"जिंदगी में कभी-कभी उम्मीद से ज़्यादा ही अच्छा होता है, बेटा।"
सुबह जब बस गंतव्य पर पहुँची, तो वे दोनों चुपचाप नीचे उतरे। वे अब भी चाची और भांजे थे, लेकिन उनकी आँखों में एक ऐसा राज था जिसे दुनिया कभी नहीं जान पाएगी।